जेपी की “मॉरल अथारिटी” और इंदिरा गाँधी को “स्टेट पॉवर” की देश को ज़रूरत: चंद्रशेखर (पूर्व प्रधानमंत्री)
जो रुख इंदिरा गाँधी ने अपनाया था, वैसे में उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. ऐसा भी नहीं था कि सारी परिस्थितियाँ अचानक प्रगट हो गईं.
अगर इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बने रहना था तो आपातकाल के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं था.
इंद्रकुमार गुजराल हमारे पुराने मित्रों में से हैं. गुजराल इंदिरा गाँधी के सलाहकारों में से एक थे.
एक दिन गुजराल हमारे पास आए. उन्होंने कहा कि आपका और इंदिरा जी का समझौता हो जाना चाहिए.
हमने कहा कि समझौते की कोई बात ही नहीं है. हम लोग दो रास्तों पर चल रहे हैं. इंदिरा गाँधी के लिए ऐसा करना मज़बूरी ही थी.
हमने गुजराल से कहा कि थोड़े दिन बाद यह ख़बर पढ़ोगे कि मैं ट्रक से दबकर मर गया या जेल चला गया.
गुजराल कहने लगे कि आप ऐसा क्यों सोचते हैं? इंदिरा गाँधी को जवाहरलाल नेहरू ने ट्रेनिंग दी है.
मैंने उनसे कहा कि मैं जवाहरलाल नेहरू को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता. उनसे मेरा कोई परिचय भी नहीं था.
मैंने तो अपनी विवशता जाहिर कर दी. मैंने गुजराल से कह दिया कि “न तो मैं बदलने वाला हूँ, न ही वो.” इस मुलाकात के 15 दिनों के भीतर इमरजेंसी लग गई.
सलाह मशविरा
मैंने चुनावों को लेकर कोई सलाह तो दी नहीं थी. हाँ, एक ही दिन मैंने जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गाँधी को ख़त लिखा था.
इंदिरा गाँधी को अंग्रेजी में और जयप्रकाश नारायण को हिंदी में पत्र लिखा.
मैंने जेपी को लिखा कि “जो लोग आपके साथ आ रहे हैं, उनका संपूर्ण क्राँति से कोई लेना देना नहीं है.
ये लोग आपके साथ सिर्फ़ इसलिए हैं ताकि इनको “पॉवर पॉलिटिक्स” में हिस्सेदारी मिल सके और ये नौज़वान नेता आने वाले दिनों में जातियों के नेता हो जाएंगे.
अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ये लोग आपको भी भूल जाएंगे. इंदिरा गाँधी को लिखा कि कम्युनिस्ट आपको आगे बढ़ा रहे हैं.
आपके और जेपी के बीच झगड़ा होगा तो देश का भारी नुक़सान होगा. आदर्शों और सिद्धांतों पर आपका उनसे मतभेद नहीं है.
मैंने एक सार्वजनिक बयान दिया कि देश को आज जेपी की “मॉरल ऑथिरिटी” और इंदिरा गाँधी को “स्टेट पॉवर” की ज़रूरत है.
दोनों को मिलाकर देश का भला हो सकता है. अन्यथा देश पर खतरों के बादल मंडरा रहे हैं. किसी ने मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लिया.
एक समय लग रहा था कि जेपी और इंदिरा गाँधी में समझौता हो जाएगा.
जब समझौता करीब-करीब फाइनल स्टेज में पहुँच गया तो हमारे मित्र रामनाथ गोयनका और गंगा बाबू ने उसमें अड़ंगा लगा दिया.
व्यक्तित्व
राजनीति के शिखर पर आज जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे वे हज़ार गुना अच्छी थीं.
लेकिन सत्ता उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी. पॉवर अपने हाथ में रखना चाहती थीं.
इसी कारण न तो वह देश का भला कर सकीं और न ही अपना. उनकी सोच थी कि पॉवर परिवार को ही मिलनी चाहिए. बेटे को ही मिलनी चाहिए.
जिन लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया था, उनकी सोच यह थी कि यह महिला कुछ नहीं कर पाएगी. और वे लोग सत्ता को अपने मन-मुताबिक चला सकेंगे.
लेकिन हुआ इसके उलट. हाथ में पॉवर आने के बाद वह अपने ढंग से सत्ता चलाने लगीं. लेकिन उनकी इच्छाशक्ति बहुत दृढ़ थी.
('चंद्रशेखर-रहबरी के सवाल' से साभार)
Thursday, November 12, 2009
Thursday, October 1, 2009
फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-3
जब लालाराम ठाकुर डाकू जेल से छूट कर आता है, तो विक्रम मल्लाह उसे पूरा सम्मान देता है। रायफल देता है। लेकिन लालाराम के मुँह से पहला वाक़्य जो निकलता है और जिस लहज़े में निकलता है, उससे जात-पात की बू आती है। उसकी बात मल्लाह डाकुओं को अच्छी नहीं लगती है, लेकिन सह लेते हैं। लालाराम को एक मल्लाह के हाथ नीचे डाकू बने रहना स्वीकार न था। वह ज़ल्दी ही मल्लाह को धोखे से मारकर कायरता का परिचय देता है। फूलन के साथी सभी ठाकुर डाकू सामूहिक बलात्कार कर अपनी वीरता का झण्डा ऊँचा करते हैं ! लेकिन इससे भी ठाकुर के पत्थर कलेजे को ठंडक नहीं पहुँचती है, तब लालाराम बेहमई गाँव में फूलन को पूरे गाँव की मौजूदगी में नग्न कर देता है और उसे पानी भरने को कहता है। उसके बाल पकड़कर एक एक को दिखाता है कि ये मल्लाह ख़ुद को देवी कहकर बुलाती है। मुझे इसने मादरचोद कहा था। गाँव के सारे ठाकुर फूलन को नग्न देखते हैं। कोई विरोध नहीं करता एक औरत को इस हद तक ज़लील करने की। उस वक़्त हवा को भी जैसे लकवा मार जाता है।
फूलन इस सबके बाद जी जाती है, जितना फूलन ने सहा किसी खाते-पीते घर की औरत को यह सहना पड़ता। या किसी भी दबंग को यह सहना पड़ता, तो शायद सत्ता में, गाँव में, और हर जगह अपनी मूँछ पर बल देकर घुमने वाले दबंग की पेशानी भीग जाती। लेकिन फूलन के साथ अनेकों बार हुए बलात्कारों, ज़्यादतियों को सत्ता ने कोई तरजीह नहीं दी। आज भी आये दिन दलितों, आदिवासियों और ग़रीब स्त्रियों के साथ बलात्कार और ज़्यादतियों की ख़बरे कम नहीं सुनने-पढ़ने में आती है। लेकिन किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगती है। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। धार ज़िले के गाँव में कमज़ोर वर्ग की दो औरतों को निर्वस्त्र कर गाँव भर में घुमाया गया था। उन्हें भी वैसे ही देखा गया जैसे बेहमई गाँव में फूलन को देखा गया था।
कहने का मतलब यह है कि आज भी स्त्रियों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि बढ़ते ही जा रहे हैं। जबकि स्त्रियों के मुद्दों पर काम करने के नाम पर, उन्हें चेतना संपन्न बनाने और उनके अधिकारों को बहाल कराने के नाम पर हज़ारों एन.जी. ओ. खुले हैं। लेकिन इस सब के जो नतीजे हैं, उससे वे कोई भी अंजान नहीं हैं, जिनके ज़िम्मे ज़िम्मेदारियाँ हैं, बस.. खामौश है। वह खामौशी शायद मुँह में भ्रष्टाचार की मलाई होने की वजह से है ! या फिर स्त्रियों की एक बड़ी जमात का फूलन के अनुसरण करने की है। भविष्य के खिसे में क्या है कभी तो राज़ खुलेगा !
14 फरवरी 1981 वह दिन था, जब फूलन, मानसिंह और साथी डाकुओं ने बेहमई गाँव के 24 ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना ने राज्य और केन्द्र की सरकार की चिंता बढ़ा दी। क्योंकि म.प्र. और केन्द्र की सरकार में ठाकुर लाबी हावी थी। केन्द्र में देश की जनता को एमरजेंसी का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री थी। शायद उन्हीं दिनों प्रधानमंत्री पंजाब की राजनीति को नया रंग देने में व्यस्त थी, जिसका परिणाम देश ने बाद में देखा और फिर भोगा भी। लेकिन वही समय था, जब फूलन का ग़ुस्सा चंबल के किनारे तोड़ खौफ़ का पर्याय बन गया था। गाँव की सत्ता हो, देश की सत्ता हो या फिर सरकारी महकमा दबंग जहाँ कहीं था, विद्रोही फूलन के नाम से उसकी सांस ऊपर-नीचे हो रही थी। राज्य और केन्द्र की सरकार पर ठाकुर मंत्रियों का दबाव बढ़ रहा था। इसी के चलते सरकार ने फूलन के गिरोह को नष्ट करने का आदेश दिया। फिर पुलिस जितनी अमानवीय तरीक़े से फूलन के साथ पेश आ सकती थी, आयी। ठाकुर डाकू लालाराम और पुलिस ने या कहो लो सरकार ने मिलकर बागी फूलन की गेंग के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया। पहली बार में फूलन के गिरोह के दस बागियों को ढेर कर दिया। जंगल में पीने के पानी स्त्रोतों में ज़हर मिला दिया। फूलन को 12 फरवरी 1983 को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस तरह फूलन के बागी जीवन का अंत हुआ। एक फूलन का बाग़ी जीवन ख़त्म हुआ। लेकिन जिस आर्थिक, सामाजिक ग़ैरबराबरी की खाई ने फूलन को बाग़ी बनाया वह संकरी न हुई, बल्कि चौड़ी होती जा रही है, जिससे बाग़ी नये-नये रूप में दिखाई दे रहे हैं।
(बिजूका से साभार)
फूलन इस सबके बाद जी जाती है, जितना फूलन ने सहा किसी खाते-पीते घर की औरत को यह सहना पड़ता। या किसी भी दबंग को यह सहना पड़ता, तो शायद सत्ता में, गाँव में, और हर जगह अपनी मूँछ पर बल देकर घुमने वाले दबंग की पेशानी भीग जाती। लेकिन फूलन के साथ अनेकों बार हुए बलात्कारों, ज़्यादतियों को सत्ता ने कोई तरजीह नहीं दी। आज भी आये दिन दलितों, आदिवासियों और ग़रीब स्त्रियों के साथ बलात्कार और ज़्यादतियों की ख़बरे कम नहीं सुनने-पढ़ने में आती है। लेकिन किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगती है। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। धार ज़िले के गाँव में कमज़ोर वर्ग की दो औरतों को निर्वस्त्र कर गाँव भर में घुमाया गया था। उन्हें भी वैसे ही देखा गया जैसे बेहमई गाँव में फूलन को देखा गया था।
कहने का मतलब यह है कि आज भी स्त्रियों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि बढ़ते ही जा रहे हैं। जबकि स्त्रियों के मुद्दों पर काम करने के नाम पर, उन्हें चेतना संपन्न बनाने और उनके अधिकारों को बहाल कराने के नाम पर हज़ारों एन.जी. ओ. खुले हैं। लेकिन इस सब के जो नतीजे हैं, उससे वे कोई भी अंजान नहीं हैं, जिनके ज़िम्मे ज़िम्मेदारियाँ हैं, बस.. खामौश है। वह खामौशी शायद मुँह में भ्रष्टाचार की मलाई होने की वजह से है ! या फिर स्त्रियों की एक बड़ी जमात का फूलन के अनुसरण करने की है। भविष्य के खिसे में क्या है कभी तो राज़ खुलेगा !
14 फरवरी 1981 वह दिन था, जब फूलन, मानसिंह और साथी डाकुओं ने बेहमई गाँव के 24 ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना ने राज्य और केन्द्र की सरकार की चिंता बढ़ा दी। क्योंकि म.प्र. और केन्द्र की सरकार में ठाकुर लाबी हावी थी। केन्द्र में देश की जनता को एमरजेंसी का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री थी। शायद उन्हीं दिनों प्रधानमंत्री पंजाब की राजनीति को नया रंग देने में व्यस्त थी, जिसका परिणाम देश ने बाद में देखा और फिर भोगा भी। लेकिन वही समय था, जब फूलन का ग़ुस्सा चंबल के किनारे तोड़ खौफ़ का पर्याय बन गया था। गाँव की सत्ता हो, देश की सत्ता हो या फिर सरकारी महकमा दबंग जहाँ कहीं था, विद्रोही फूलन के नाम से उसकी सांस ऊपर-नीचे हो रही थी। राज्य और केन्द्र की सरकार पर ठाकुर मंत्रियों का दबाव बढ़ रहा था। इसी के चलते सरकार ने फूलन के गिरोह को नष्ट करने का आदेश दिया। फिर पुलिस जितनी अमानवीय तरीक़े से फूलन के साथ पेश आ सकती थी, आयी। ठाकुर डाकू लालाराम और पुलिस ने या कहो लो सरकार ने मिलकर बागी फूलन की गेंग के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया। पहली बार में फूलन के गिरोह के दस बागियों को ढेर कर दिया। जंगल में पीने के पानी स्त्रोतों में ज़हर मिला दिया। फूलन को 12 फरवरी 1983 को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस तरह फूलन के बागी जीवन का अंत हुआ। एक फूलन का बाग़ी जीवन ख़त्म हुआ। लेकिन जिस आर्थिक, सामाजिक ग़ैरबराबरी की खाई ने फूलन को बाग़ी बनाया वह संकरी न हुई, बल्कि चौड़ी होती जा रही है, जिससे बाग़ी नये-नये रूप में दिखाई दे रहे हैं।
(बिजूका से साभार)
फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-2
फूलन मायके में ही जवान होती है। उसकी जवानी पर गाँव के सरपंच के आवारा मोड़े और उसके साथी मोड़ों की नज़र होती है। वे उसे आते-जाते छेड़ते हैं और एक दिन खेत में अकेली को घेरकर ज़बरदस्ती करने की कोशिश करते हैं। ज़बरदस्ती तो नहीं कर पाते, लेकिन सब मिलकर उसे बुरी तरह से पीटते हैं। गाँव में पंचायत बैठती है और फूलन पर बदचलनी का एक तरफ़ा आरोप लगा उसे गाँव बाहर कर देती है। बार-बार प्रताड़ित, बार-बार बलात्कार फूलन के विद्रोही स्वभाव को कुचल नहीं पाता, बल्कि और भड़काता है।
जब वह बंदूक थाम लेती है। पुत्तीलाल से बदला लेने पहुँचती है। पुत्तीलाल को गधे पर बैठाया जाता है। फिर लकड़ी के खम्बे से बाँध कर मारती-पीटती है। लेकिन जब वह यह कर रही होती है, उसके कान में ख़ुद की ही चीत्कार गूँजती है। वह चीत्कार जो कभी पुत्तीलाल द्वारा ज़बरदस्ती करने का विरोध करते हुए ससुराल में गूँजी थी। ग्यारह बरस की एक बहू जब मदद के लिए चीत्कार रही थी। सास दरवाजा भीड़कर दूसरी तरफ़ चली गयी थी। बदला लेते वक़्त उसे वह सब याद आ रहा था। उसकी छटपटाहट, उसे ग़ुस्से का पारावार किसी की भी मग़ज़ सुन्न कर देने वाला होता है। यहाँ फूलन अपने साथी विक्रम मल्लाह से कहती है- एस पी को चीट्ठी लिख…, अगर कोई छोटी मोड़ी को ब्याहेगा तो जान ले लूँगी।
जब फूलन को यह सब भोगना पड़ रहा था, तब केन्द्र और म.प्र. में काँग्रेस की सरकार थी। वही काँग्रेस, जो आज़ादी के बाद से ख़ुद को दबे-कुचलों के हित का ध्यान रखने वाली पार्टी होने का ढींढ़ोरा पीटती रही है। वही काँग्रेस जिसका इतिहास आज़ादी के आँदोलन में महत्तपूर्ण भूमिका निभाने वाला रहा है। उस पर धीरे-धीरे दबंगों और ठाकुरों ने किस तरह से कब्जा कर लिया। उस काँग्रेस का जैसे अर्थ ही बदल गया। जब फूलन अपने मान-सम्मान का बदला लेने और ख़ुद को ज़िन्दा बचाये रखने की लड़ाई लड़ रही थी, तब प्रदेश और देश की राजनीति में और सरकारों में भी ठाकुरों का ही बोलबाला था। इन ठाकुर नेताओं के संरक्षण में या आड़ में कह लो, इनके रिश्तेदार, और ख़ुद इन्हीं के द्वारा ग़रीब और मज़दूर वर्ग के लोगों पर किये जाने वाले शोषण और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी।
जंगल में भी जो ठाकुर डाकू थे, उनका दूसरे डाकू गिरोहों पर दबदबा था। जो उनके दबदबे को स्वीकार नहीं करता था, उसे या तो ख़ुद डाकू ही मार देते या पुलिस से मरवा देते। सरकार, पुलिस और डाकू सभी में ठकुराइ के प्रति बड़ी वफ़ादारी थी। डाकू बाबू गुर्जर को तो विक्रम मल्लाह उस वक़्त मार देता है, जब वह बीहड़ में फूलन के साथ ज़बरदस्ती कर रहा होता है। उसके कुछ वफ़ादारों को भी मार देता है और गेंग का लीडर बन जाता है।
जब वह बंदूक थाम लेती है। पुत्तीलाल से बदला लेने पहुँचती है। पुत्तीलाल को गधे पर बैठाया जाता है। फिर लकड़ी के खम्बे से बाँध कर मारती-पीटती है। लेकिन जब वह यह कर रही होती है, उसके कान में ख़ुद की ही चीत्कार गूँजती है। वह चीत्कार जो कभी पुत्तीलाल द्वारा ज़बरदस्ती करने का विरोध करते हुए ससुराल में गूँजी थी। ग्यारह बरस की एक बहू जब मदद के लिए चीत्कार रही थी। सास दरवाजा भीड़कर दूसरी तरफ़ चली गयी थी। बदला लेते वक़्त उसे वह सब याद आ रहा था। उसकी छटपटाहट, उसे ग़ुस्से का पारावार किसी की भी मग़ज़ सुन्न कर देने वाला होता है। यहाँ फूलन अपने साथी विक्रम मल्लाह से कहती है- एस पी को चीट्ठी लिख…, अगर कोई छोटी मोड़ी को ब्याहेगा तो जान ले लूँगी।
जब फूलन को यह सब भोगना पड़ रहा था, तब केन्द्र और म.प्र. में काँग्रेस की सरकार थी। वही काँग्रेस, जो आज़ादी के बाद से ख़ुद को दबे-कुचलों के हित का ध्यान रखने वाली पार्टी होने का ढींढ़ोरा पीटती रही है। वही काँग्रेस जिसका इतिहास आज़ादी के आँदोलन में महत्तपूर्ण भूमिका निभाने वाला रहा है। उस पर धीरे-धीरे दबंगों और ठाकुरों ने किस तरह से कब्जा कर लिया। उस काँग्रेस का जैसे अर्थ ही बदल गया। जब फूलन अपने मान-सम्मान का बदला लेने और ख़ुद को ज़िन्दा बचाये रखने की लड़ाई लड़ रही थी, तब प्रदेश और देश की राजनीति में और सरकारों में भी ठाकुरों का ही बोलबाला था। इन ठाकुर नेताओं के संरक्षण में या आड़ में कह लो, इनके रिश्तेदार, और ख़ुद इन्हीं के द्वारा ग़रीब और मज़दूर वर्ग के लोगों पर किये जाने वाले शोषण और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी।
जंगल में भी जो ठाकुर डाकू थे, उनका दूसरे डाकू गिरोहों पर दबदबा था। जो उनके दबदबे को स्वीकार नहीं करता था, उसे या तो ख़ुद डाकू ही मार देते या पुलिस से मरवा देते। सरकार, पुलिस और डाकू सभी में ठकुराइ के प्रति बड़ी वफ़ादारी थी। डाकू बाबू गुर्जर को तो विक्रम मल्लाह उस वक़्त मार देता है, जब वह बीहड़ में फूलन के साथ ज़बरदस्ती कर रहा होता है। उसके कुछ वफ़ादारों को भी मार देता है और गेंग का लीडर बन जाता है।
Thursday, September 17, 2009
फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-1
"मैं फूलन देवी हूँ भेनचोद.. मैं हूँ।"
बेंडिट क्वीन फ़िल्म का यह पहला संवाद है, जो दर्शक के कपाल पर भाटे की नुकीली कत्तल की माफिक टकराता है। अगर दर्शक किसी भी तरह के आलस्य के साथ फ़िल्म देखने बैठा है, या बैठा तो स्क्रीन के सामने है और मग़ज़ में और ही कुछ गुन्ताड़े भँवरे की तरह गुन गुन कर रहे हैं, तो सब एक ही झटके में दूर छिटक जाते हैं। दर्शक पूरी तरह से स्क्रीन पर आँखें जमाकर और मग़ज़ के भीतर के भँवरे पर काबू पाकर केवल फ़िल्म देखता है और फ़िल्म यहीं से फ्लैश बैक में चली जाती है।
स्क्रीन पर नमुदार होते हैं, चप्पू के हत्थे को थामें मल्लहा के हाथ, और फिर पूरी नाव। नाव चंबल की सतह पर धीरे से आगे खिसकती है, अपनी गोदी में आदमी, औरत, बच्चे, पोटली, ऊँट और भी बहुत कुछ मन के भीतर का, जो नाव में सवार चेहरों पर दिखता है। शायद काम की तलाश, शायद गाँव को छोड़ने का दुख और भी कुछ। दर्शक इन्हीं चेहरों में खोजता है ख़ुद को और कुछ सोचने की तरफ़ बढ़ता है कि भूरे, मटमेले, ऊँचे बीहड़ों में से निकलता है बकरियों का एक झुण्ड। नदी किनारे आते झुण्ड के पीछे चल रहे हैं एक दाना (बुजुर्ग) और किशोर। यह पूरा दृश्य दर्शक के मन में रोज़गार के अभाव और विस्थापन की त्रसदी की चित्रात्मक कहानी बुनता है।
फिर आता है एक बच्ची की हाँक में एक बच्ची को बुलावा- फूलन … ए फूलन…
वह 1968 की एक दोपहर थी, जिसमें फूलन को पुकार रही थी एक बच्ची, जो शायद उसी की बहन थी। लेकिन ग्यारह बरस की फूलन अपनी सखियों के साथ नदी में किनारे पर डुबुक-डुबुक डूबकियाँ लगा रही थीं। वे केवल नहा नहीं रही थी, बल्कि सब सखियाँ मिलकर नदी में एकदूसरी के साथ और नदी के पानी के साथ खेल रही थीं। एकदम निश्चिंत और उन्मुक्त। शायद ये बेदधड़कपन और उन्मुक्तता चंबल के पानी में घुला कोई तत्व था, जो फूलन के भीतर कुछ ज़्यादा ही मात्रा में घुल गया था।
इस बार हाँक थोड़ी नज़दीक से और कुछ ज़ोर से आयी- फूलन…. ए फूलन…
फूलन ने देखा अपनी बहन के साथ और वहीं से पूछा- कईं है………..
तो के बुला रये ..
काई …?
मोके ना मालुम…
नदी से बाहर आती फूलन सरसों की एक कच्ची फली की तरह नन्हीं लगती है, लेकिन सवालों से भरी आँखें बोलती लगती है। फूलन के नदी से बाहर आने और घर पहुँचने के बीच, फ़िल्म में यह स्थापित किया जा चुका होता है कि फूलन को उसका पति पुत्तीलाल लेने आया है। पुत्तीलाल की उम्र क़रीब 27-28 बरस है। फूलन की माँ अनुरोध करती है कि अभी मोड़ी ग्यारह बरस की ही है। कुछ महीने बाद गौना कर देंगे। लेकिन पुत्तीलाल नहीं मानता है। अपनी माँ के बूढ़ी होने की वजह से काम न कर पाने का हवाला देता है। कहता है कि उसे मोड़ियों की कमी नहीं है। यही नहीं, बल्कि रिश्ता तोड़ने की भी धमकी देता है। फूलन का पिता भी समझाता है, लेकिन जब पुत्तीलाल नहीं मानता और किसी कर्ज़ माँगने वाले की तरह बात करता है। उसे दी गयी गाय को खूँटे से छोड़ लेता है। तब फूलन के पिता कहते हैं – ले जाने दे, अपन को कौन मोड़ी को घर में रखना है। और कोई ऊँच-नीच हो गयी तो … आदि..आदि चिंताएँ व्यक्त करता है। अंततः ग्यारा बरस की फूलन को 27-28 बरस के पुत्तीलाल के साथ रवाना कर दी जाती है।
फूलन का माँ-बाप से अलग होना और पुत्तीलाल के साथ जाने का दृश्य बहुत ही मार्मिक है। जैसे कोई गाय का दूध धाहती बछड़ी को स्तनों से अलग खींचता है और वह दौड़कर फिर स्तन को मुँह में ले लेती है। लेकिन जब बछड़ी स्तन को मुँह में लेने जाये और गाय भी उसे लात या भिट मारने को विवश हो जाये, तब दोनों ही पर क्या गुज़रती होगी, जबकि उस वक़्त उसे स्नेह के दूध की बेहद ज़रुरत होती है। दर्शक के मन में यही दृश्य उभरता है।
जब ससुराल पहुँचती है। फूलन गाँव के बीच के कुए पर गारे का हण्डा लेकर पानी भरने जाती है। अभी भी कई गाँव में दबंगों और नीची समझी जाने वाली जाती के लोगों के पानी के कुए अलग-अलग होते हैं। लेकिन फूलन की ससुराल में 1968 में भी ठाकुर और मल्लाह का एक ही कुए से पानी भरना बताया है। एक कुए से पानी भरते हैं, लेकिन एक दूसरे के बर्तनों को आपस में छूने से बचाते हैं। पानी खींचने की रस्सी, बल्टी भी अलग रखते हैं। लेकिन जब ग्यारह बरस की बहू को पता नहीं होता है, और अनजाने में या भूल से वह ठाकुर वाली बाल्टी को छूने लगती है, तो कुए से पानी भरने वाली ठकुराइने वहीं उसे घुड़क देती है और वह दूसरे छोर से, दूसरी रस्सी,बाल्टी लेकर कुए से पानी खींचती है। पानी लेकर चलती है, तो उसका हम उम्र मोड़ा और मोड़ों के साथ मिलकर उसका हण्डा फोड़ देता है। फूलन हण्डा फोड़ने वालों पर ज़ोर से चिल्लाती है, उसका चिल्लाना ठकुराइनों के कान खड़े कर देता है।
जब बग़ैर पानी लिए घर पहुँचती है, तो सास हण्डा फूटने की बात को लेकर डाँटती है। फूलन का सास के सामने भी वही तेवर बरकरार होता है। वह सास को ताना मारती है- गारे का हण्डा टूट गया, तो पीतल का लाओ, जैसे ठकुराइनों के पास है।
सास को यह ताना गचता है। गचना स्वाभाविक भी है, क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति ठाकुरों की बराबरी करने की नहीं होती है। सास कहती है- बहुत जबान चलती है, बुलाऊँ पुत्तीलाल को..
पुत्तीलाल फूलन को इस बात पर मारता है। वही पुत्तीलाल रात में ग्यारह बरस की फूलन के साथ बलात्कार करता है। पुत्तीलाल के इस कृत्य ने फूलन के जीवन में किसी भी तरह के सुख की संभावना को जैसे पोंछ दिया था। उस घटना से फूलन के मन में पुरुष के प्रति जो घृण का रिसाव हुआ, वह पूरी फ़िल्म में कई जगह प्रकट होता है। फूलन भागकर माइके आ जाती है। पुत्तीलाल से रिश्ता ख़त्म हो जाता है।
बेंडिट क्वीन फ़िल्म का यह पहला संवाद है, जो दर्शक के कपाल पर भाटे की नुकीली कत्तल की माफिक टकराता है। अगर दर्शक किसी भी तरह के आलस्य के साथ फ़िल्म देखने बैठा है, या बैठा तो स्क्रीन के सामने है और मग़ज़ में और ही कुछ गुन्ताड़े भँवरे की तरह गुन गुन कर रहे हैं, तो सब एक ही झटके में दूर छिटक जाते हैं। दर्शक पूरी तरह से स्क्रीन पर आँखें जमाकर और मग़ज़ के भीतर के भँवरे पर काबू पाकर केवल फ़िल्म देखता है और फ़िल्म यहीं से फ्लैश बैक में चली जाती है।
स्क्रीन पर नमुदार होते हैं, चप्पू के हत्थे को थामें मल्लहा के हाथ, और फिर पूरी नाव। नाव चंबल की सतह पर धीरे से आगे खिसकती है, अपनी गोदी में आदमी, औरत, बच्चे, पोटली, ऊँट और भी बहुत कुछ मन के भीतर का, जो नाव में सवार चेहरों पर दिखता है। शायद काम की तलाश, शायद गाँव को छोड़ने का दुख और भी कुछ। दर्शक इन्हीं चेहरों में खोजता है ख़ुद को और कुछ सोचने की तरफ़ बढ़ता है कि भूरे, मटमेले, ऊँचे बीहड़ों में से निकलता है बकरियों का एक झुण्ड। नदी किनारे आते झुण्ड के पीछे चल रहे हैं एक दाना (बुजुर्ग) और किशोर। यह पूरा दृश्य दर्शक के मन में रोज़गार के अभाव और विस्थापन की त्रसदी की चित्रात्मक कहानी बुनता है।
फिर आता है एक बच्ची की हाँक में एक बच्ची को बुलावा- फूलन … ए फूलन…
वह 1968 की एक दोपहर थी, जिसमें फूलन को पुकार रही थी एक बच्ची, जो शायद उसी की बहन थी। लेकिन ग्यारह बरस की फूलन अपनी सखियों के साथ नदी में किनारे पर डुबुक-डुबुक डूबकियाँ लगा रही थीं। वे केवल नहा नहीं रही थी, बल्कि सब सखियाँ मिलकर नदी में एकदूसरी के साथ और नदी के पानी के साथ खेल रही थीं। एकदम निश्चिंत और उन्मुक्त। शायद ये बेदधड़कपन और उन्मुक्तता चंबल के पानी में घुला कोई तत्व था, जो फूलन के भीतर कुछ ज़्यादा ही मात्रा में घुल गया था।
इस बार हाँक थोड़ी नज़दीक से और कुछ ज़ोर से आयी- फूलन…. ए फूलन…
फूलन ने देखा अपनी बहन के साथ और वहीं से पूछा- कईं है………..
तो के बुला रये ..
काई …?
मोके ना मालुम…
नदी से बाहर आती फूलन सरसों की एक कच्ची फली की तरह नन्हीं लगती है, लेकिन सवालों से भरी आँखें बोलती लगती है। फूलन के नदी से बाहर आने और घर पहुँचने के बीच, फ़िल्म में यह स्थापित किया जा चुका होता है कि फूलन को उसका पति पुत्तीलाल लेने आया है। पुत्तीलाल की उम्र क़रीब 27-28 बरस है। फूलन की माँ अनुरोध करती है कि अभी मोड़ी ग्यारह बरस की ही है। कुछ महीने बाद गौना कर देंगे। लेकिन पुत्तीलाल नहीं मानता है। अपनी माँ के बूढ़ी होने की वजह से काम न कर पाने का हवाला देता है। कहता है कि उसे मोड़ियों की कमी नहीं है। यही नहीं, बल्कि रिश्ता तोड़ने की भी धमकी देता है। फूलन का पिता भी समझाता है, लेकिन जब पुत्तीलाल नहीं मानता और किसी कर्ज़ माँगने वाले की तरह बात करता है। उसे दी गयी गाय को खूँटे से छोड़ लेता है। तब फूलन के पिता कहते हैं – ले जाने दे, अपन को कौन मोड़ी को घर में रखना है। और कोई ऊँच-नीच हो गयी तो … आदि..आदि चिंताएँ व्यक्त करता है। अंततः ग्यारा बरस की फूलन को 27-28 बरस के पुत्तीलाल के साथ रवाना कर दी जाती है।
फूलन का माँ-बाप से अलग होना और पुत्तीलाल के साथ जाने का दृश्य बहुत ही मार्मिक है। जैसे कोई गाय का दूध धाहती बछड़ी को स्तनों से अलग खींचता है और वह दौड़कर फिर स्तन को मुँह में ले लेती है। लेकिन जब बछड़ी स्तन को मुँह में लेने जाये और गाय भी उसे लात या भिट मारने को विवश हो जाये, तब दोनों ही पर क्या गुज़रती होगी, जबकि उस वक़्त उसे स्नेह के दूध की बेहद ज़रुरत होती है। दर्शक के मन में यही दृश्य उभरता है।
जब ससुराल पहुँचती है। फूलन गाँव के बीच के कुए पर गारे का हण्डा लेकर पानी भरने जाती है। अभी भी कई गाँव में दबंगों और नीची समझी जाने वाली जाती के लोगों के पानी के कुए अलग-अलग होते हैं। लेकिन फूलन की ससुराल में 1968 में भी ठाकुर और मल्लाह का एक ही कुए से पानी भरना बताया है। एक कुए से पानी भरते हैं, लेकिन एक दूसरे के बर्तनों को आपस में छूने से बचाते हैं। पानी खींचने की रस्सी, बल्टी भी अलग रखते हैं। लेकिन जब ग्यारह बरस की बहू को पता नहीं होता है, और अनजाने में या भूल से वह ठाकुर वाली बाल्टी को छूने लगती है, तो कुए से पानी भरने वाली ठकुराइने वहीं उसे घुड़क देती है और वह दूसरे छोर से, दूसरी रस्सी,बाल्टी लेकर कुए से पानी खींचती है। पानी लेकर चलती है, तो उसका हम उम्र मोड़ा और मोड़ों के साथ मिलकर उसका हण्डा फोड़ देता है। फूलन हण्डा फोड़ने वालों पर ज़ोर से चिल्लाती है, उसका चिल्लाना ठकुराइनों के कान खड़े कर देता है।
जब बग़ैर पानी लिए घर पहुँचती है, तो सास हण्डा फूटने की बात को लेकर डाँटती है। फूलन का सास के सामने भी वही तेवर बरकरार होता है। वह सास को ताना मारती है- गारे का हण्डा टूट गया, तो पीतल का लाओ, जैसे ठकुराइनों के पास है।
सास को यह ताना गचता है। गचना स्वाभाविक भी है, क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति ठाकुरों की बराबरी करने की नहीं होती है। सास कहती है- बहुत जबान चलती है, बुलाऊँ पुत्तीलाल को..
पुत्तीलाल फूलन को इस बात पर मारता है। वही पुत्तीलाल रात में ग्यारह बरस की फूलन के साथ बलात्कार करता है। पुत्तीलाल के इस कृत्य ने फूलन के जीवन में किसी भी तरह के सुख की संभावना को जैसे पोंछ दिया था। उस घटना से फूलन के मन में पुरुष के प्रति जो घृण का रिसाव हुआ, वह पूरी फ़िल्म में कई जगह प्रकट होता है। फूलन भागकर माइके आ जाती है। पुत्तीलाल से रिश्ता ख़त्म हो जाता है।
Monday, September 14, 2009
ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या....3
पार्ट-3
तीन नवंबर, 2001 को जारी दूसरे वीडियो टेप में भी बीमार ओसामा ने अमेरिका की आलोचना की थी और मुस्लिमों से कहा था कि वे हमले पर खुशी जताएँ, लेकिन उसने किसी भी अवसर पर यह नहीं माना कि वह हमले में शामिल था। ग्रिफिन का दावा है कि 13 दिसंबर, 2001 को ओसामा की मौत होने के बाद अमेरिकी सरकार ने नया वीडियो जारी किया जिसमें लादेन ने अपने पूर्व बयानों से हटते हुए 11 सितंबर के हमलों की सारी जिम्मेदारी स्वीकारी और यह बताने की कोशिश की कि किस तरह हमला किया गया।
कहा गया कि यह टेप जलालाबाद, अफगानिस्तान में एक घर में अमेरिकी सैनिकों को मिला था, जबकि इसके साथ जुड़ा एक लेबल यह दर्शाता है कि इसे 9 नवंबर, 2001 को बनाया गया था। अमेरिका और ब्रिटेन में कहा गया कि इस वीडियो से साफ है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमला उसी ने कराया था।
ग्रिफिन का कहना है कि स्वीकृति वाला यह वीडियो टेप जितने सवालों के उत्तर नहीं देता है उससे ज्यादा संख्या में सवाल खड़े करता है क्योंकि इस टेप में ओसामा बिल्कुल अलग दिखता है। इसमें वह भारी आदमी दिखता है जिसकी दाढ़ी पूरी तरह से काली है। उसकी पीली त्वचा का रंग भी काला पड़ गया है। उसकी नाक भी बदली हुई है और दुबली पतली अँगुलियों वाले हाथ किसी मुक्केबाज जैसे हाथों में बदल गए हैं। ऐसा लगता है कि उसका स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया है।
इससे पहले लादेन को अपने दाहिने हाथ से लिखते देखा गया था, लेकिन वास्तव में वह बाँए हाथ से लिखता था। उनका कहना है कि सिविल इंजीनियरिंग पढ़े ओसामा से इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है कि वह ऐसी बातें कहता, जबकि आतंकवादी बनने से पहले वह बड़ी-बड़ी इमारतें बनाने वाला ठेकेदार था।
ग्रिफिन का कहना है कि अल कायदा प्रमुख को पता होना चाहिए कि ट्विन टॉवर्स में लोहे का नहीं वरन स्टील का इस्तेमाल किया गया था और पूरी इमारत में लगे स्टील या लोहे को पिघलने के लिए 2800 डिग्री फारेनहाइट की गर्मी चाहिए थी, जबकि विमान के ईंधन, हाइड्रोकार्बन आग, 1800 डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक तक नहीं पहुँचती है।
उनका कहना है कि इस बात को मानने के लिए बहुत से कारण हैं कि 2001 के बाद के सभी टेप फर्जी हैं क्योंकि ये सभी ऐसे समय पर आए जब बुश प्रशासन को दुनिया की मदद की जरूरत थी। ओसामा की हमले की स्वीकारोक्ति संबंधी टेप भी तब आया जब बुश और ब्लेयर यह सिद्ध नहीं कर सके कि आतंकवादी हमले के लिए ओसामा जिम्मेदार है।
ग्रिफिन का दावा है कि पश्चिमी देशों की सरकारों ने अत्याधुनिक स्पेशल इफेक्ट्स फिल्म तकनीक से बिन लादेन की इमेज और वोकल रिकॉर्डिंग्स को बदल डाला। अब सबाल उठता है कि अगर ये फर्जी थे तो अल कायदा चुप क्यों रहा?
असली बिन लादेन का क्या हुआ?
वास्तव में उग्रवादी संगठन मिल रहे प्रचार से खुश है क्योंकि इसका समर्थन कम हो रहा था। उसने भी इस मिथ को बढ़ावा दिया कि इसका करिश्माई नेता अभी भी जिंदा है ताकि इसके साथ जुड़ने वालों को प्रोत्साहित किया जा सके। वास्तव में आतंकवादी हमले के चार माह बाद जनवरी, 2002 को लादेन की बीमारी से मरने के समाचार प्रमुखता में आए।
इस संबंध में पाकिस्तानी नेताओं, परवेज मुशर्रफ से लेकर जरदारी तक, के बयान ध्यान देने योग्य हैं जिनमें कहा गया है कि ओसामा अब जिंदा नहीं है। डॉक्टरों का भी कहना है कि किडनी की बीमारी से लड़ने के लिए जिस मशीन की जरूरत होती है उसे साथ लेकर पहाड़ी दर्रों में घूमना संभव ही नहीं है।
ग्रिफिन की किताब में यह भी लिखा है कि किडनी की बीमारी से जुड़े यूरिनरी इनफेक्शन का इलाज ओसामा ने आतंकवादी हमले से दो माह पहले जुलाई 2001 में दुबई के एक अस्पताल में कराया था। तभी उसने अफगानिस्तान के लिए मोबाइल डायलिसिस मशीन का ऑर्डर दिया था। डायलिसिस कराने के लिए उसे डॉक्टरों के साथ एक निश्चित स्थान पर नियमित तौर पर रहना पड़ता होगा।
इस बात पर भी गौर करें कि 26 दिसंबर 2001 को मिस्र के एक समाचार-पत्र अल फवाद में एक छोटा-सा समाचार प्रकाशित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि अफगान तालिबान के एक प्रमुख अधिकारी ने घोषणा की थी कि 13 दिसंबर को या इस समय के आसपास ओसामा बिन लादेन को दफनाया गया है।
अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है रिपोर्ट में कहा गया था कि बीमारी की गंभीर जटिलताओं के चलते वह स्वाभाविक मौत मर गया। तोरा-बोरा में उसे दफनाया गया और इस अवसर पर तीस अल कायदा लड़ाके मौजूद थे। करीबी परिजन और मित्र भी वहीं थे। वहाबी परंपरा के मुताबिक उसकी कब्र पर कोई निशान नहीं छोड़ा गया था।
इस तालिबान अधिकारी का नाम नहीं छापा गया था, लेकिन उसका दावा था कि उसने कफन में लिपटे ओसामा को देखा था। तब वह कमजोर लेकिन शांतचित्त और आत्मविश्वास से भरा लग रहा था। तब अमेरिका और ब्रिटेन में क्रिसमस का शोर था और किसी ने भी इस खबर पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके बाद भी लादेन के टेप सामने आते रहे हैं और उसको पकड़ने पर अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं लेकिन वह तो धुँए की तरह गायब हो गया है।
अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है।
हॉलीवुड अभिनेता चार्ली शीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा है कि वे आतंकवादी हमलों की दुबारा जाँच कराएँ क्योंकि हो सकता है कि हमलों के पीछे बुश सरकार का ही हाथ हो। उन्होंने अपनी शॉर्ट फिल्म '20 मिनट्स विद द प्रेसीडेंट' के जरिए यह दावा किया है।
उनका दावा है कि बुश प्रशासन हमलों के पीछे था जिसे इसके बाद इराक युद्ध को न्यायसंगत ठहराने का कारण मिल गया था। उनका यहाँ तक दावा है कि आतंकवादी हमले के समय तक ओसामा बिन लादेन भी सीआईए के साथ काम कर रहा था।
तीन नवंबर, 2001 को जारी दूसरे वीडियो टेप में भी बीमार ओसामा ने अमेरिका की आलोचना की थी और मुस्लिमों से कहा था कि वे हमले पर खुशी जताएँ, लेकिन उसने किसी भी अवसर पर यह नहीं माना कि वह हमले में शामिल था। ग्रिफिन का दावा है कि 13 दिसंबर, 2001 को ओसामा की मौत होने के बाद अमेरिकी सरकार ने नया वीडियो जारी किया जिसमें लादेन ने अपने पूर्व बयानों से हटते हुए 11 सितंबर के हमलों की सारी जिम्मेदारी स्वीकारी और यह बताने की कोशिश की कि किस तरह हमला किया गया।
कहा गया कि यह टेप जलालाबाद, अफगानिस्तान में एक घर में अमेरिकी सैनिकों को मिला था, जबकि इसके साथ जुड़ा एक लेबल यह दर्शाता है कि इसे 9 नवंबर, 2001 को बनाया गया था। अमेरिका और ब्रिटेन में कहा गया कि इस वीडियो से साफ है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमला उसी ने कराया था।
ग्रिफिन का कहना है कि स्वीकृति वाला यह वीडियो टेप जितने सवालों के उत्तर नहीं देता है उससे ज्यादा संख्या में सवाल खड़े करता है क्योंकि इस टेप में ओसामा बिल्कुल अलग दिखता है। इसमें वह भारी आदमी दिखता है जिसकी दाढ़ी पूरी तरह से काली है। उसकी पीली त्वचा का रंग भी काला पड़ गया है। उसकी नाक भी बदली हुई है और दुबली पतली अँगुलियों वाले हाथ किसी मुक्केबाज जैसे हाथों में बदल गए हैं। ऐसा लगता है कि उसका स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया है।
इससे पहले लादेन को अपने दाहिने हाथ से लिखते देखा गया था, लेकिन वास्तव में वह बाँए हाथ से लिखता था। उनका कहना है कि सिविल इंजीनियरिंग पढ़े ओसामा से इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है कि वह ऐसी बातें कहता, जबकि आतंकवादी बनने से पहले वह बड़ी-बड़ी इमारतें बनाने वाला ठेकेदार था।
ग्रिफिन का कहना है कि अल कायदा प्रमुख को पता होना चाहिए कि ट्विन टॉवर्स में लोहे का नहीं वरन स्टील का इस्तेमाल किया गया था और पूरी इमारत में लगे स्टील या लोहे को पिघलने के लिए 2800 डिग्री फारेनहाइट की गर्मी चाहिए थी, जबकि विमान के ईंधन, हाइड्रोकार्बन आग, 1800 डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक तक नहीं पहुँचती है।
उनका कहना है कि इस बात को मानने के लिए बहुत से कारण हैं कि 2001 के बाद के सभी टेप फर्जी हैं क्योंकि ये सभी ऐसे समय पर आए जब बुश प्रशासन को दुनिया की मदद की जरूरत थी। ओसामा की हमले की स्वीकारोक्ति संबंधी टेप भी तब आया जब बुश और ब्लेयर यह सिद्ध नहीं कर सके कि आतंकवादी हमले के लिए ओसामा जिम्मेदार है।
ग्रिफिन का दावा है कि पश्चिमी देशों की सरकारों ने अत्याधुनिक स्पेशल इफेक्ट्स फिल्म तकनीक से बिन लादेन की इमेज और वोकल रिकॉर्डिंग्स को बदल डाला। अब सबाल उठता है कि अगर ये फर्जी थे तो अल कायदा चुप क्यों रहा?
असली बिन लादेन का क्या हुआ?
वास्तव में उग्रवादी संगठन मिल रहे प्रचार से खुश है क्योंकि इसका समर्थन कम हो रहा था। उसने भी इस मिथ को बढ़ावा दिया कि इसका करिश्माई नेता अभी भी जिंदा है ताकि इसके साथ जुड़ने वालों को प्रोत्साहित किया जा सके। वास्तव में आतंकवादी हमले के चार माह बाद जनवरी, 2002 को लादेन की बीमारी से मरने के समाचार प्रमुखता में आए।
इस संबंध में पाकिस्तानी नेताओं, परवेज मुशर्रफ से लेकर जरदारी तक, के बयान ध्यान देने योग्य हैं जिनमें कहा गया है कि ओसामा अब जिंदा नहीं है। डॉक्टरों का भी कहना है कि किडनी की बीमारी से लड़ने के लिए जिस मशीन की जरूरत होती है उसे साथ लेकर पहाड़ी दर्रों में घूमना संभव ही नहीं है।
ग्रिफिन की किताब में यह भी लिखा है कि किडनी की बीमारी से जुड़े यूरिनरी इनफेक्शन का इलाज ओसामा ने आतंकवादी हमले से दो माह पहले जुलाई 2001 में दुबई के एक अस्पताल में कराया था। तभी उसने अफगानिस्तान के लिए मोबाइल डायलिसिस मशीन का ऑर्डर दिया था। डायलिसिस कराने के लिए उसे डॉक्टरों के साथ एक निश्चित स्थान पर नियमित तौर पर रहना पड़ता होगा।
इस बात पर भी गौर करें कि 26 दिसंबर 2001 को मिस्र के एक समाचार-पत्र अल फवाद में एक छोटा-सा समाचार प्रकाशित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि अफगान तालिबान के एक प्रमुख अधिकारी ने घोषणा की थी कि 13 दिसंबर को या इस समय के आसपास ओसामा बिन लादेन को दफनाया गया है।
अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है रिपोर्ट में कहा गया था कि बीमारी की गंभीर जटिलताओं के चलते वह स्वाभाविक मौत मर गया। तोरा-बोरा में उसे दफनाया गया और इस अवसर पर तीस अल कायदा लड़ाके मौजूद थे। करीबी परिजन और मित्र भी वहीं थे। वहाबी परंपरा के मुताबिक उसकी कब्र पर कोई निशान नहीं छोड़ा गया था।
इस तालिबान अधिकारी का नाम नहीं छापा गया था, लेकिन उसका दावा था कि उसने कफन में लिपटे ओसामा को देखा था। तब वह कमजोर लेकिन शांतचित्त और आत्मविश्वास से भरा लग रहा था। तब अमेरिका और ब्रिटेन में क्रिसमस का शोर था और किसी ने भी इस खबर पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके बाद भी लादेन के टेप सामने आते रहे हैं और उसको पकड़ने पर अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं लेकिन वह तो धुँए की तरह गायब हो गया है।
अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है।
हॉलीवुड अभिनेता चार्ली शीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा है कि वे आतंकवादी हमलों की दुबारा जाँच कराएँ क्योंकि हो सकता है कि हमलों के पीछे बुश सरकार का ही हाथ हो। उन्होंने अपनी शॉर्ट फिल्म '20 मिनट्स विद द प्रेसीडेंट' के जरिए यह दावा किया है।
उनका दावा है कि बुश प्रशासन हमलों के पीछे था जिसे इसके बाद इराक युद्ध को न्यायसंगत ठहराने का कारण मिल गया था। उनका यहाँ तक दावा है कि आतंकवादी हमले के समय तक ओसामा बिन लादेन भी सीआईए के साथ काम कर रहा था।
ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या.....Part -2
Part -2
हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन में एक किताब आई है, जिसका शीर्षक है 'ओसामा बिन लादेन : डैड ऑर अलाइव'। राजनीतिक विश्लेषक और दार्शनिक प्रोफेसर डेविड रे ग्रिफिन की इस किताब में ओसामा की संभावित मौत और पश्चिमी देशों द्वारा इसे छिपाने को लेकर विस्तृत और तर्कसंगत जानकारी दी गई है।
इस पुस्तक में दावा किया गया है कि किडनी के फेल होने से या इससे संबंधित किसी बीमारी की शिकायत से ओसामा की मौत हो चुकी है और यह 13 दिसंबर, 2001 या इसके आसपास की घटना हो सकती है। इस समय वह वजीरिस्तान की सीमा से लगे तोरा बोरा की पहाडि़यों में रह रहा था। उनका मानना है कि मुस्लिम धार्मिक नियमों के अनुरूप 24 घंटों के भीतर ही उसको दफन भी कर दिया गया। उसकी कब्र को भी चिन्हित नहीं किया गया है क्योंकि वहाबी मुस्लिमों में ऐसा ही रिवाज है।
लेखक का दावा है कि इस तारीख के बाद के बहुत से टेपों में दुनिया को यह भरोसा दिलाया गया है कि ओसामा जिंदा है। उनका यहाँ तक कहना है कि ये टेप भी फर्जी हैं और इनका उद्देश्य है कि इराक और अफगानिस्तान में चल रहे आतंक के खिलाफ युद्ध के लिए दुनिया के समर्थन और सहायता को सुनिश्चित किया जा सके।
ग्रिफिन की बात को समझने के लिए हमे गौर करना होगा कि 11 सितंबर को आतंकी हमले के बाद पश्चिम की क्या प्रतिक्रिया थी? एक महीने के दौरान ही 7 अक्टूबर को अमेरिका और ब्रिटिश विमानों ने तोरा-बोरा क्षेत्र पर बड़े हवाई हमले किए थे।
इस सैन्य हमले में इस बात को नकार दिया गया था कि इससे पहले अल कायदा के आधिकारिक बयानों में अरब प्रेस को जानकारी दी गई थी कि 11 सितंबर होने वाले हमलों में उसका कोई हाथ नहीं था।
इतना ही नहीं 28 सितंबर को और आतंकवादी हमले के एक पखवाड़े के बाद 28 सितंबर को चौथी बार ओसामा का कहना था कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं शामिल नहीं हूँ। एक मुस्लिम होने के नाते मैं यथासंभव झूठ बोलने से बचता हूँ। मुझे कोई जानकारी नहीं है और न ही मैं निर्दोष महिलाओं, बच्चों और लोगों की हत्याओं को प्रशंसा योग्य कृत्य नहीं मानता'।
तोरा-बोरा पर अमेरिकी, ब्रिटिश हमले के कुछेक घंटों बाद ही 7 अक्टूबर को अपने पहले वीडियो टेप में ओसामा सैनिक ड्रेस और इस्लामिक हैडड्रेस में दिखा था। कंधे पर असाल्ट राइफल लटकी हुई थी और तब वह पीला और कमजोर दिख रहा था। अपने भाषण में उसने बुश को कोसा था, लेकिन तब भी आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था।
हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन में एक किताब आई है, जिसका शीर्षक है 'ओसामा बिन लादेन : डैड ऑर अलाइव'। राजनीतिक विश्लेषक और दार्शनिक प्रोफेसर डेविड रे ग्रिफिन की इस किताब में ओसामा की संभावित मौत और पश्चिमी देशों द्वारा इसे छिपाने को लेकर विस्तृत और तर्कसंगत जानकारी दी गई है।
इस पुस्तक में दावा किया गया है कि किडनी के फेल होने से या इससे संबंधित किसी बीमारी की शिकायत से ओसामा की मौत हो चुकी है और यह 13 दिसंबर, 2001 या इसके आसपास की घटना हो सकती है। इस समय वह वजीरिस्तान की सीमा से लगे तोरा बोरा की पहाडि़यों में रह रहा था। उनका मानना है कि मुस्लिम धार्मिक नियमों के अनुरूप 24 घंटों के भीतर ही उसको दफन भी कर दिया गया। उसकी कब्र को भी चिन्हित नहीं किया गया है क्योंकि वहाबी मुस्लिमों में ऐसा ही रिवाज है।
लेखक का दावा है कि इस तारीख के बाद के बहुत से टेपों में दुनिया को यह भरोसा दिलाया गया है कि ओसामा जिंदा है। उनका यहाँ तक कहना है कि ये टेप भी फर्जी हैं और इनका उद्देश्य है कि इराक और अफगानिस्तान में चल रहे आतंक के खिलाफ युद्ध के लिए दुनिया के समर्थन और सहायता को सुनिश्चित किया जा सके।
ग्रिफिन की बात को समझने के लिए हमे गौर करना होगा कि 11 सितंबर को आतंकी हमले के बाद पश्चिम की क्या प्रतिक्रिया थी? एक महीने के दौरान ही 7 अक्टूबर को अमेरिका और ब्रिटिश विमानों ने तोरा-बोरा क्षेत्र पर बड़े हवाई हमले किए थे।
इस सैन्य हमले में इस बात को नकार दिया गया था कि इससे पहले अल कायदा के आधिकारिक बयानों में अरब प्रेस को जानकारी दी गई थी कि 11 सितंबर होने वाले हमलों में उसका कोई हाथ नहीं था।
इतना ही नहीं 28 सितंबर को और आतंकवादी हमले के एक पखवाड़े के बाद 28 सितंबर को चौथी बार ओसामा का कहना था कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं शामिल नहीं हूँ। एक मुस्लिम होने के नाते मैं यथासंभव झूठ बोलने से बचता हूँ। मुझे कोई जानकारी नहीं है और न ही मैं निर्दोष महिलाओं, बच्चों और लोगों की हत्याओं को प्रशंसा योग्य कृत्य नहीं मानता'।
तोरा-बोरा पर अमेरिकी, ब्रिटिश हमले के कुछेक घंटों बाद ही 7 अक्टूबर को अपने पहले वीडियो टेप में ओसामा सैनिक ड्रेस और इस्लामिक हैडड्रेस में दिखा था। कंधे पर असाल्ट राइफल लटकी हुई थी और तब वह पीला और कमजोर दिख रहा था। अपने भाषण में उसने बुश को कोसा था, लेकिन तब भी आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था।
ओसामा बिन लादेन: हकीकत क्या है?
part-1
परत दर परत..... ..... विश्लेषण..... .....
पश्चिमी देशों विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन लगातार इस बात का दावा करते रहे हैं कि विश्व का खूँखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिंदा है और वह समय समय पर अपनी धमकियों से इस बात की पुष्टि करता रहता है, लेकिन अब पश्चिमी देशों में यह धारणा जोर पकड़ रही है कि वास्तव में ओसामा बिन लादेन कम से कम सात वर्ष पहले ही मर चुका है और उसे जिंदा रखने का काम पश्चिमी देशों की सरकारें कर रही हैं ताकि आतंकवाद के खिलाफ कथित युद्ध को तब तक चलाया जा सके जब तक कि उनके उद्देश्य पूरे नहीं हो जाते।
क्या यह नहीं हो सकता है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमलों के शुरुआती दिनों के बाद से जो ऑडियो और वीडियो उसके नाम पर जारी किए गए हैं, वे सभी फर्जी हैं? क्या यह संभव नहीं है कि ओसामा को जिंदा बनाए रखने का काम ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ कर रही हैं ताकि आतंक के खिलाफ युद्ध में अपने यूरोपीय सहयोगी देशों की मदद लेती रहें?
ओसामा के जिंदा होने की धारणा के ठीक विपरीत बहुत सारे सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि इन महत्वपूर्ण तथ्यों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अमेरिका की स्पेक्टेटर पत्रिका में अमेरिका खुफिया सेवा के पूर्व अधिकारी और वरिष्ठ संपादक एंजेलो एम. कोडविला ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 'सारे सबूत यह दर्शाते हैं कि आज ओसामा बिन लादेन की तुलना में एल्विस प्रेज्ली ज्यादा सजीव हैं'।
बोस्टन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर कोडविला का कहना था कि कथित तौर पर लादेन के नाम से जारी होने वाले वीडियोज में बहुत सारी खामियाँ हैं। वर्षों तक ओसामा को देखे जाने का कोई सबूत नहीं है और 2001 के अंतिम भाग तक अल कायदा नेता के जो संदेश पकड़े जाते थे उनका पकड़ा जाना पूरी तरह से बंद हो गया था।
उनका यह भी कहना है कि वे वीडियो और ऑडियो जिन्हें ओसामा की ओर से जारी किए जाने का दावा किया जाता है, वे निष्पक्ष जानकारों को प्रभावित नहीं करते। वीडियोज में तो दो तरह के ओसामा दिखाई देते हैं। कुछ में वह अरबी भाषी लोगों जैसा और सीधी पतली नाक वाला दिखता है तो कुछ में उसकी नाक छोटी और मोटी लगती है।
ड्यूक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रूस लॉरेंस का मानना है कि पहले और बाद के ऑडियो में ओसामा की भाषा बदलती गई है। पहले के ऑडियोज में वह अल्लाह और पैगम्बर मोहम्मद के नामों का हवाला देना नहीं भूलता था, लेकिन बाद के ऑडियोज में ऐसा नहीं है। उनका कहना है कि एक वीडियो में तो ओसामा की अँगुलियों में अँगूठियाँ भी हैं, जबकि उसके जैसे वहाबी धर्मावलम्बियों के लिए किसी तरह के आभूषण पहनना वर्जित है।
परत दर परत..... ..... विश्लेषण..... .....
पश्चिमी देशों विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन लगातार इस बात का दावा करते रहे हैं कि विश्व का खूँखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिंदा है और वह समय समय पर अपनी धमकियों से इस बात की पुष्टि करता रहता है, लेकिन अब पश्चिमी देशों में यह धारणा जोर पकड़ रही है कि वास्तव में ओसामा बिन लादेन कम से कम सात वर्ष पहले ही मर चुका है और उसे जिंदा रखने का काम पश्चिमी देशों की सरकारें कर रही हैं ताकि आतंकवाद के खिलाफ कथित युद्ध को तब तक चलाया जा सके जब तक कि उनके उद्देश्य पूरे नहीं हो जाते।
क्या यह नहीं हो सकता है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमलों के शुरुआती दिनों के बाद से जो ऑडियो और वीडियो उसके नाम पर जारी किए गए हैं, वे सभी फर्जी हैं? क्या यह संभव नहीं है कि ओसामा को जिंदा बनाए रखने का काम ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ कर रही हैं ताकि आतंक के खिलाफ युद्ध में अपने यूरोपीय सहयोगी देशों की मदद लेती रहें?
ओसामा के जिंदा होने की धारणा के ठीक विपरीत बहुत सारे सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि इन महत्वपूर्ण तथ्यों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अमेरिका की स्पेक्टेटर पत्रिका में अमेरिका खुफिया सेवा के पूर्व अधिकारी और वरिष्ठ संपादक एंजेलो एम. कोडविला ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 'सारे सबूत यह दर्शाते हैं कि आज ओसामा बिन लादेन की तुलना में एल्विस प्रेज्ली ज्यादा सजीव हैं'।
बोस्टन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर कोडविला का कहना था कि कथित तौर पर लादेन के नाम से जारी होने वाले वीडियोज में बहुत सारी खामियाँ हैं। वर्षों तक ओसामा को देखे जाने का कोई सबूत नहीं है और 2001 के अंतिम भाग तक अल कायदा नेता के जो संदेश पकड़े जाते थे उनका पकड़ा जाना पूरी तरह से बंद हो गया था।
उनका यह भी कहना है कि वे वीडियो और ऑडियो जिन्हें ओसामा की ओर से जारी किए जाने का दावा किया जाता है, वे निष्पक्ष जानकारों को प्रभावित नहीं करते। वीडियोज में तो दो तरह के ओसामा दिखाई देते हैं। कुछ में वह अरबी भाषी लोगों जैसा और सीधी पतली नाक वाला दिखता है तो कुछ में उसकी नाक छोटी और मोटी लगती है।
ड्यूक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रूस लॉरेंस का मानना है कि पहले और बाद के ऑडियो में ओसामा की भाषा बदलती गई है। पहले के ऑडियोज में वह अल्लाह और पैगम्बर मोहम्मद के नामों का हवाला देना नहीं भूलता था, लेकिन बाद के ऑडियोज में ऐसा नहीं है। उनका कहना है कि एक वीडियो में तो ओसामा की अँगुलियों में अँगूठियाँ भी हैं, जबकि उसके जैसे वहाबी धर्मावलम्बियों के लिए किसी तरह के आभूषण पहनना वर्जित है।
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